venus kesari
हिन्दी भाषा को लेकर जो प्रकरण मुंबई में हुआ, सभी का मन आहत है और होना भी चाहिए अगर कोई हिन्दी बोलने भर से थप्पड़ खाए 
मगर क्या हिन्दी शर्मसार हुई ???
मुझे नहीं लगता की हिन्दी शर्मसार हुई या हिन्दी प्रेमियों के लिए ये कोई काला दिवस होना चाहिए |  शर्मसार तो राजनीति हुई और ये भी कोई नई बात नहीं है ........

शायद  हिन्दी  उस  समय  ज्यादा  शर्मसार  होती  है  जब  गाँव  के  सरकारी  स्कूल  में  जाँच  होती है और पता चलता है की  चार और पांच में पढने वाले बच्चे को  "इमला"  लिखना नहीं आता

मगर शायद आज ये भी आम बात हो गई है,   या फिर हमें इसकी आदत................

मैंने भी यूं ही पोस्ट लिख डाली दिल में बात थी जो किसी से कहना चाहता था, सो कह डाली .... आपकी क्या राय है ???

venus kesari


आज दिनांक 4 सितम्बर २009 को मेरे ब्लॉग का एक वर्ष का सफ़र पूरा हुआ 

ब्लोगिंग का सफ़र इस लिए नहीं कह सकता क्योकि मैं ब्लोगिंग तो मार्च २००८ से कर रहा हूँ पहले पूरे ६ महीने तक ब्लोगिंग से एक पाठक के तौर पर जुडा रहा फिर
गुरु जी श्री पंकज  सुबीर जी के आदेश पर ५ सितम्बर २००८ को ब्लॉग "आते हुए लोग" बनाया 

गुरु जी की विशेष कृपा रही मुझ पर, आपने हमेशा मेरी गलतियों को सुधारा और नित नई जानकारी देते रहे गजल की बारीकियों से अवगत कराया और हौसला बढाया 

ब्लोगिंग से अनेक अच्छे लोगों से परिचय हुआ, मेल मिलाप हुआ और बहुत सारा प्रेम और स्नेह मिला 

बहुत दिनों तक हिंदी युग्म और भडास से एक नियमित पाठक के तौर पर जुडा रहा मगर फिर धीरे धीरे सक्रियता कम हो गई  

आज जब एक साल पूरा हुआ तो मैंने सोचा ब्लॉग पर अपना पहला कमेन्ट खोजा जाये थोडा बहुत खोजने पर मेरा पहला कमेन्ट मिला  जो मैंने गुरु जी की कार्यशाला में एक गजल के रूप में किया था 
(गजल क्या थी एक तुक बंदी थी )



और मेरे ब्लॉग पर पहली पोस्ट पर पहला कमेन्ट नयनसुख  जी का आया था 

गजल और कविता के अलावा हल्का फुल्का तो लिखता ही रहता हूँ मगर अब जब एक साल पूरा हो चुका है तो लेख भी लिखना शुरू कर दिया 

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नयनसुख जी, शिव कुमार मिश्र जी, नीरज गोस्वामी जी, समीर जी, डा. अमर ज्योति जी, ललित मोहन त्रिवेदी जी, पवन जी, शहरोज़ जी, सतपाल जी, राजेंद्र जी, प्रदीप मनोरिया जी, सीमा गुप्ता जी, जीतेन्द्र भगत जी, रविकांत पाण्डेय जी, गौतम राजरिशी जी, तरुण जी, भवेश झा जी, योगेन्द्र मौग्दिल जी, उन्मुक्त जी, अनूप शुक्ल जी, रंजन जी, रंजना रंजू भाटिया जी, कामोद जी, इ गुरु राजीव जी, सिद्धेश्वर जी, ममता जी, कुश जी, अशोक पाण्डेय जी, परमजीत बाली जी, जाकिर अली रजनीश जी, ताऊ रामपुरिया जी, महावीर जी, शिव राज गुजर जी, अंकित "सफ़र"जी, प्रकाश सिंह "अर्श"जी, पल्लवी त्रिवेदी जी, शुरेश चन्द्र गुप्ता जी, विनय जी,  प्रमेन्द्र जी, राज भाटिया जी, हरकीरत हकीर जी, राजीव करुणानिधि जी, देव जी, बृजमोहन जी, अनवरुल हसन जी, कविता वाचक्नवी जी, सतीश चन्द्र जी, श्यामल सुमन जी, महक जी, सर्वत जमाल जी, प्रेम फरुखाबादी जी, संगीता पूरी जी, कंचन सिंह चौहान जी, के के यादव जी, अविनाश वाचस्पति जी, रूपचंद्र शास्त्री मयंक जी, बबली जी, शिखा जी, दिगंबर नासवा जी, पवन कुमार जी, भूपेन्द्र सिंह जी, काजल कुमार जी, अनिल जी, आलोक सिंह जी, कुन्नू जी, गर्दू गाफिल जी, के एम् मिश्र जी, संजीव गौतम जी, रजनीश परिहार जी, शोभना चौरे जी, मुफलिस जी, अरविन्द मिश्रा जी, क्थेलीओ जी, हेम पाण्डेय जी, श्रद्धा जैन जी, नवनीत जी, अशोक कुमार पाण्डेय जी, अखिलेश्वर पाण्डेय जी, प्रभात जी, क्रान्ति जी, एम् वर्मा जी, मनु जी, पूनम जी, दिलीप राज  जी, राजू जी, मनीष कुमार जी, कौस्तुभ जी, प्रिया जी, स्वप्न जी, श्याम कोरी उदय जी, शमा जी, अनिल पुसदकर जी, प्रवीण जाखड जी, दिनेश राय द्विवेदी जी, नीरज रोहिल्ला जी, मुकेश जी, प्रकाश "पाखी"जी,  निर्मला कपिला जी, अनिल कान्त जी, ज्योत्सना जी, अलबेला खत्री जी, विवेक रस्तोगी जी, अर्कजेश जी, नजर जी, लता "हया" जी, कुमारेन्द्र जी, दर्पण साह "दर्शन"जी,  नितीश जी, राज जी, अजित वडनेरकर जी, आशा जोगलेकर जी, बी एस पाबला जी, अर्शिया जी, सुमन जी, विवेक सिंह जी, लवली कुमारी जी, वत्स जी, अमिताभ मीत जी, सोनालिका जी, जोगेश्वर जी, मयंक के के जी, हर्ष जी
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आपने टिप्पडी करके मेरा हौसला बढाया, मार्गदर्शन किया मेरे विचारों से सहमत, असहमत हुए और अंपने विचार रखे आप सभी को हार्दिक धन्यवाद..........
 निवेदन है प्रेम आशीष बनाये रखें 
ताऊ रामपुरिया जी, प्रभात जी, शंकर जी, श्याम कोरी उदयजी, अर्श जी, सर्वात जमाल जी, गौतम राजरिशी जी, उर्मी जी नज़र जी, संजीव गौतम जी, शारदा जी, एम वर्मा जी, पूनम अग्रवाल जी, संजय कुमार जी, पूर्वी जी, अरुण कुमार जी, अनिल पुसदकर जी, निर्मला कपिला जी, महक जी, शमा जी, रचना जी, प्रकाश "पाखी" जी, सलीम जी, नवल राज जी, अंकित जी, अर्शिया जी, दिगंबर नासवा जी

आप सभी का भी बहुत बहुत शुक्रिया की आपने मेरे ब्लॉग का समर्थन किया और मेरे ब्लॉग को हमेशा पढ़ा और सराहा 

----आपका वीनस केसरी ----

venus kesari

90 के दशक में जैसे अन्य बच्चों का बचपना पूरे बचपने के साथ गुजर रहा था हम भी अपने बच्चेपन को पूरे बचपने के साथ निभा रहे थे 
आज जब बच्चों में बचपना गायब देखता हूँ तो बड़ी कोफ्त होती है 

लिटिल चैम्प्स रियलिटी शो में दो बच्चे एंकर की भूमिका में हैं उनके संवाद सुनिए और बचपना खोजिये .......

वैसे ये भी सही है की झुनझुना की जगह मोबाईल की रिंगटोन में ले ली है मगर ये क्या की बच्चा ३ साल का हुआ नहीं की घर निकाला दे दिया, जाओ बेटा प्ले स्कूल

अभी कल की बात है एक ग्राहक मेरी दुकान पर आये और कलर माँगा 
मैंने पुछा कौन सा ?
मोम कलर, पेन्सिल कलर, स्केच कलर, वाटर कलर, क्ले कलर, फैब्रिक कलर, पोस्टल कलर .....
इतने में बोल पड़े अभी अभी एडमीशन कराया है मुझे नहीं पता कौन सा कलर ये लिख कर दिया है देखिये 
पर्चा देखा लिखा था वाटर कलर 
मैंने पूछा बच्चा किस क्लास में है 

ग्राहक :  "प्ले स्कूल में" 
क्या उम्र है ?
ग्राहक :  "३ साल का होने वाला है "
मैंने अपना माथा पीट लिया 
बताइए  जिसने पेन्सिल छीलनी ना सीखी हो उसे वाटर कलर दिया जा रहा है ..........................................

ग्राहक को कलर दे कर रुखसत किया और सोचने लगा जब हम तीन साल के थे (अजी ३ का तो याद ही नहीं) 8 साल के थे तब क्या कर रहे थे .......
यादों के दरिया में, नाव बिना पतवार के बह चली... और जब किनारे पहुचे तो समझ आया की हमारा बचपना कितने बचपने के साथ  गुजर गया 



बचपन में अक्सर मैं देखा करता था रिक्शा के पीछे लिखा होता था "निरिख खो गई"
जब कई साल तक समझ ना आया की इसका क्या मतलब, तब "बोल राधा बोल" पिक्चर देखी और ज्ञान के कपाट खुले :)

झट समझ आ गया की जैसे कादिर खान ने गाँव में चिट्ठी भेजी थी "राधा खो गई" उसी तरह किसी ने हर रिक्शे पर लिखवा दिया है "निरिख खो गई"
कितनी सुन्दर कहानी बुनी हमने,......... सोचा एक मामा होगा जो अपनी भांजी के साथ इलाहाबाद संगम नहाने आया होगा बेचारे से भांजी खो गई होगी अब घर वालों से कैसे कहे बेटी खो गई सो कभी घर नहीं गया होगा और रिक्शा में लिखवा के कही भाग गया होगा जिससे घर वालों को पता चल जाये निरिख खो गई है 
जब कई साल तक निरिख खोई ही रही तो मुझे बड़ा दुःख होता था और एकाध बार भगवान् से पूछा भी की निरिख कब मिलेगी 

फिर एक दिन जब पता चला की रिक्शा में हर साल रजिस्टर्ड नंबर एलाट होता है और टीन की पत्ती रिक्शा में लगाई जाती है और जब पत्ती खो जाती है तो चालान कटता है उस टीन की पत्ती को "निरिख" कहते है 
रिक्शा वाले चालान से बचने के लिए लिख लेते है  " निरिख खो गई "
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पिछली पोस्ट पर सलाह मांगी थी की लेख नए ब्लॉग में लिखू या इस पुराने ब्लॉग में, 
इस विषय पर जितनी सलाह मिली सभी ने कहा "इसी ब्लॉग पर लेख लिखों" 
इसलिए लेख के लिए जो नया ब्लॉग बनाया था उसे डिलीट कर दिया है और जो कुछ अगड़म बगड़म लिखूंगा यही चेप दिया करूंगा :)

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